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Saturday, September 25, 2010

"पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ"
बहुत दिन से इस ब्लाग पर कुछ लिख नही पाई। अब इसकी शुरूआत कुछ ऐसी रचनाओं से और उसके लेखकों से कर रही हूँ जिनके कुछ शब्द दिल को छू जाते हैं। आज बात करते हैं 'पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ'। कल मुझे एक  पंजाबी पुस्तक भेंट स्वरूप मिली । इसके लेखक स. गुरप्रीत गरेवाल जी हैं। शिक्षा एम. ए. लोक प्रशासन मे की है। उनका परिचय पहले अपनी एक पोस्ट मे करवा चुकी हूँ। आज बहुत ढूँढा उस पोस्ट को मिली नही अगर मिली तो उसका लिन्क दूँगी। बस ये जान लें कि ये लडका हमारे शहर का गौरव है। मात्र 30 साल की उम्र तक उसने ज़िन्दगी को इतने करीब से देखा और भोगा है कि हर पल के दुख को उसने हर पल की खुशी बना लिया।वो अजीत हिन्दी पंजाबी अखबार के संवाददाता है।उनका नारा है" पेड लगाओ और सब को हंसाओ" हर आदमी की गम्भीर या मजाक की बात इतने ध्यान से सुनते हैं कि उससे ही जीवन दर्शन और हसने हसाने के लिये कुछ न कुछ ढूँढ लेते हैं। उनके व्यक्तित्व के बारे मे बाकी फिर लिखूँगी। आज बात कर रही हूँ उनकी पुस्तक के इस टाईटल की "पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ"। टाईटल मेरे दिल को छू गया। पंजाबी मे बहुत सी बातों के दो अर्थ होते हैं। मैने इसका अर्थ इस पुस्तक के लिये इस तरह से निकाला कि जैसे बाजरे की मुट्ठ को देख कर कबूतर आते हैं वैसे ही बातचीत की कला भी इस बाजरे की मुट्ठ की तरह है जिस के कारण लोग आपके नज़दीक आते हैं और ये गुरप्रीत का व्यक्तित्व भी है। मगर फिर सोचा कि एक बार उससे पूछ भी लूँ क्यों कि मेरा पंजाबी मे कुछ हाथ तंग भी है। सुबह सुबह  उसे फोन लगाया बेचारा आँखें मलता हुया उठा तो उसने बताया कि इसका मतलव है कि मैने बाजरे की मुट्ठ डाल दी है।  इसे उसके शब्दों मे यहाँ लिख रही हूँ{ पंजाबी से हिन्दी अनुवाद}
"जिद्दी सिमरण  की बदौलत मेरे घर मे कभी बाजरा समाप्त नही होता। मै दिन की शुरूआत पक्षियों को बाजरा डाल कर करता हूँ।छत पर बहुत पक्षी आते हैं। जब सात समुद्र पार से सिमरण का फोन आता है तो उसे सब से पहले यही बताता हूँ- डाल दी मैने बाजरे की मूठ [पा ती अडिये बाजरे दी मुठ]। सिमरण को किसी पहुंचे हुये महात्मा ने बताया था कि बाजरा डालने से अगले जन्म मे मुलाकात हो जाती है। अब जब फोन आयेगा तो  जरूर पूछूँगा कि क्या कोई  महात्मा इस जन्म के बारे मे नही बताता।"
 उसकी इन छोटी छोटी बातों का संग्रह है ये पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ जिस मे उसके 21 आलेख इन छोटी छोटी आम जीवन की बात चीत और उनसे उपजी अच्छी बुरी संवेदनायें हैं। उसका जीवन एक खुली किताब है जिसे जो चाहे जब मर्जी पढे और उसका व्यवहार भी निश्छल, प्रेम भावना समर्पण जैसा है। शायद ही इस शहर मे कोई ऐसा हो जो उसका दोस्त मित्र भाई बहन या माँ बाप की तरह न हो। वो हर महफिल की शान है। कितने लडके ऐसे हैं जिन्हें उसने जीवन की राह सुझाई है। कोई एन आर आई शहर मे आ जाये बस उससे किसी न किसी स्कूल के बच्चों को कुछ न कुछ सहायता दिलवा देता है कभी पेड लगवा देता है तो कभी साहित्यकारों का सम्मान करवा देता है। मुझे लेखन के लिये प्रोत्साहन देने वाला और कविता गोष्टियों मे आग्रहपूर्वक ले जाने वाला गुरप्रीत ही है। आज अगर नंगल मे साहित्य समारोह होते हैं या कोई भी साहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं तो ये गुरप्रीत की कोशिशों और सहयोग का फल है। अगर उसने प्रोत्साहन न दिया होता तो आज यहाँ न होती। एक बेटे की तरह हर सुख दुख मे उसका साथ है। यही नही प्रयास कला मंच का गठन कर देश के  कई प्राँतो मे पंजाब की ओर से नाट्कों मे पंजाब का नाम रोशन किया और उसके इस रंग मंच ने कितने कलाकार दिये जिनमे कुछ आज पंजाबी फिल्मों मे काम कर रहे हैं।
ये केवल उस किताब के टाईटल को पढ कर मन मे उठे विचार है। पुस्तक की समीआ नही। इसका अनुवाद करने की कोशिश करूँगी अपनी अगली पोस्ट्स मे।
अभी इस पुस्तक के बारे मे इतना ही कहूँगी कि इसे पढते हुये आपको तभी पता चलेगा जब ये समाप्त हो जायेगी। जीवन दर्शन के आलेख पढना सभी को रुचिकर नही लगते लेकिन इसमे हर छोटी बात मे बडा जीवन दर्शन छुपा है। सं पुस्तक की  संक्षिप्त जानकारी ये है
पुस्तक का नाम------- पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ
लेखक --------------------गुरप्रीत गरेवाल
प्रकाशक -------------------लोक गीत प्रकाशन SCO-26-27-सेक्टर 34-A चंडीगढ
मूल्य ----------------------- मात्र 100 रुपये
गुरप्रीत का पता---------- भाखडा डैम रोड नंगल
फोन ------------------------ 01887 224997 मोबाईल ---- 9815624997
मुझे आशा है ये बाजरे की मूठ जैसे उसके शब्द लोगों को बरबस ही अपनी ओर खीँच लेंगे। उसे बहुत बहुत बधाई और आशीर्वाद।
    कोशिश करूँगी कि उसकी इस पुस्तक का अनुवाद  करके इस ब्लाग पर डालूँ।

26 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    कहानी ऐसे बनी– 5, छोड़ झार मुझे डूबन दे !, राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

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  2. सार्थक प्रयास..अनुवाद का इन्तजार रहेगा.

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  3. शीर्षक तो हमारी समझ में भी नहीं आया । लेकिन साफ़ करने पर लगा कि कितना मर्म है इसमें । एकदम धरती की माटी के करीब , सोंधी सोंधी खुशबू लिए हुए --बाजरे दी मुट्ठी ।

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  4. "पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ" यह पढ़ कर हमें लगा की आज कुछ खाने पीने या रसोई से सम्बंधित बात होगी परन्तु यहाँ गुरुप्रीत जी निकल आये. अच्छा लगा सब जानकार.

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  5. अनुवाद का इंतजार---

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  6. जीवन दर्शन की बातें बहुत कुछ सीख दे जाती है....गुरप्रीत जी का सम्मान करता हूँ...उत्साहित हूँ रचना का अनुवाद पढ़ने के लिए...धन्यवाद माता जी..प्रणाम

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  7. ये तो बहुत ही उपयोगी जानकारी है। आभार।

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  8. बाजरे की मुट्ठी भरी रहे, पंछी आते रहें और सृजन होता रहे इन शुभकामनाओं के साथ. निरत ब्लॉग पर पधारने के लिए ਧਨੱਵਾਦ.

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  9. ये तो बहुत ही उपयोगी जानकारी है।

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  10. अनुवाद का इंतजार---पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ

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  11. पा ती का अर्थ तो मुझे भी समझ मै नही आया? जब कि मै खास दुयाबे का हुं, अनुवाद का इंतजार रहेगा, धन्यवाद

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  12. ....पढ कर बहुत अच्छा लगा!...अनुवाद का इंतजार है!

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  13. आप अनुवाद कीजिये पढ़ने तो हम जरूर आयेंगे निर्मला जी। वैसे ज्यादा पंजाबी सानु भी नही आंदी तो तुस्सी हिंदी विच अनुवाद करोगे ता पढ़ स्कांगे।

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  14. पंजाबी के साहित्‍यकार से मिलाने का आभार। कुछ लोग ऐसे ही चुपचाप काम करते हैं। बाजरे की मुठ्ठी डालने का रिवाज राजस्‍थान में भी है।

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  15. बहुत भावपूर्ण और सुंदर, अनुवाद का इंतजार रहेगा.

    रामराम

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  16. आपको सक्रिय देखना अच्छा लग रहा है। दिन की शुरूआत का आपका ढंग भी निराला है।

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  17. अपने तो इस पुस्तक को पढने की उत्सुकता पैदा कर दी.....कल ही इस पुस्तक को खोजते हैं कहीं से...

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  18. मैडम, डालिये न इसका अनुवाद ब्लॉग पर, बहुत अपीलिंग है। दिल्ली पब्लिक लाईब्रेरी से बलवंत सिंह की रावी पार, ऐली ऐली, चक्क पीरां का जस्सा जैसी किताबें बचपन से ही पढ़ते पढ़ते दिमाग में पंजाब की एक अलग ही छवि बन गई थी। तीन साल पहले पंजाब जब ट्रांसफ़र होकर आया तो वैसा ही पंजाब देखने की इच्छा थी, लेकिन उनका पंजाब तो पुराने समय का पंजाब था। न वो पंजाब दिखा और न ही बलवंत सिंह की पुस्तकें।
    आपने इस पुस्तक का अनुवाद करने की बात कहकर एक बड़ी जिम्मेदारी ले ली है अपने सर, तंग करते रहेंगे अब आपको।

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  19. .

    निर्मला जी,

    बहुत मोहक तरीके से आपने गुरप्रीत जी का परिचय कराया। जिंदगी जिन्दादिली का नाम है , ये ऐसे लोगों से सीखने को मिलता है। आपके अनुवाद से समझने में भी बहुत आसानी हुई। हो सके तो किताब के और भी कुछ रोचक अंश अनुवाद करके हमसे बाटिये। भाषा का ज्ञान न होने से पंजाबी साहित्य तो अछूते ही रह जाते हैं। लेकिन आपकी मदद से नया सीखने को मिलेगा।

    आप मुझसे मीलों दूर हैं, लेकिन आपकी टिप्पणियों में बहुत प्यार मिलता है। आपने मुझे आशीर्वाद दिया, इसके लिए बहुत खुश हूँ और विनम्रता से आपका अभिवादन करती हूँ।

    आभार।

    .

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  20. Hamaree taraf se bhee Gurpreet ji ko bahut badhaii...

    Hindi anuvaad ka intezaar ...

    trruf ka bahut dhanyvaad Nirmalaji (
    Sadar !

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  21. सही में शीर्षक ने ही बाँध लिया है अनुवाद का इन्तजार रहेगा ..पंजाबी पढनी आती नहीं ,नहीं तो अभी मंगवा लेते इसको .शुक्रिया निर्मला जी

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  22. शुक्रिया बहुत अच्छे विषय से जानकारी दिलवाई. बहुत दिनों बात आपकी कोई पोस्ट पढ़ने को मिली. मतलब भी समझ में आता था. आपकी इस कहानी का...हाँ लेकिन सही कहा आपने की पंजाबी में कई बाते द्विअर्थी होती हैं.

    सुंदर विवरण शुक्रिया.

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  23. इस पुस्तक के बारे मे जानकर अच्छा लगा आपके अनुवाद की प्रतीक्षा रहेगी ।

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  24. Achcha laga is pustak ke bare men jan kar. aapke anuwad ki prateeksha rahegi. Wise ye bat ki do muththi najra panchiyon ko dalne se agale janam me mulakt ho jatee hai .....shayad kitab kuch bataye is bare me.

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  25. बहुत अच्छा लगा पढ कर ........

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